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मजदुर बच्चा और गरीबी (कहानी) - Child Labour and Poverty Hindi Story

मजदुर बच्चा और गरीबी (कहानी) - Child Labour and Poverty Hindi Story 


Child Labour and Poverty Hindi Story
मजदुर बच्चा और गरीबी (कहानी)


चल उठ अमन - काम पर जाना है
आज ज्यादा सो गए हम - गालिया मिलेंगी ठेकेदार से ,
युही दिन की शुरुवात हुई उस 11 साल के मासूम की, अमन को उठाने के लिए जब 12 साल के अजय ने आवाज लगाई ,

हड़बड़ा कर अमन उठा और अजय से बोला -
भाई गलती हो गई , आज मेरी वजह से तुझे भी गालिया मिलेंगी
अजय ने कहा - कोई बात नही गालिया रोटी सी लगती है आकिर भूख का सवाल है ।
इतना कहकर दोनों , फुटपाथ से उठे और पास के पियाऊ से पानी लाने के लिए पुरानी प्लास्टिक की बोत्तल लिए दौड़े दौड़े गए ।

शायद उन्हें आज जल्दी भी थी और डर भी सत्ता रहा था ।
में पास ही खड़ा ये सब देख रहा है । बहुत से विचार मन में उबाल ले रहे थे । परिस्तिथि , वर्तमान और भविष्य के सवालों में खो सा गया था ।

खेर मुझे भी ऑफिस जाना था और जहाँ वो दोनों सो रहे थे मुझे भी वही से ऑटो लेना था । लेकिन आज मेरे कदम ऑफिस न जाकर , इन दो मासूम चेहरे और मजबूर दिमाग को बारीकी से समझने की इजाजत दे रहे थे ।
में ये सोच ही रहा था तभी वो दोनों दोस्त फटे और मेले कपड़ो में ही जल्दबाजी में कही जा रहे थे और में भी उनके पीछे पीछे चलने लगा ।

लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद में एक ईंट के भटे पर पंहुचा जहाँ ये दोनों दोस्त डरे सहमे एक रौब दिखाने वाले आदमी के सामने खड़े थे । में दूर से ही उस आदमी और इन दो बच्चो की बातें सुन रहा था ।
वो आदमी इन बच्चो का गालियों से स्वागत कर रहा था और वापिस चले जाने को कह रहा था ।
लेकिन बच्चे - माफ़ करदो, माफ़ करदो , कल से गलती नही होगी । और साथ ही बोल रहे थे -
कल अधिक काम किया था - माफ़ करदो
शरीर दुख रहा था नींद ज्यादा आ गई - माफ़ करदो


खेर उस ठेकेदार ने दोनों को काम पर लगा लिया और दोनों ईंट बनाने के लिए मिटी की खुदाई करने लगे ।
लेकिन ये क्या अब वो मुस्कुरा रहे थे -
शायद मासूम होने के साथ ही दिल के सच्चे भी थे वो - आकिर मोहब्बत जो दी अपने कार्य से उन्हें ।
मासूम गरीब चेहरा व् मजबूर दिमाग था उनका
दिमाग से वे दोनों अपनी उम्र के बच्चो से लगभग 20 साल बड़े थे ।

न ही उन दोनों की बच्चो सी इच्छाएं थी न ही बड़ो सा रॉब । मात्र मज़बूरी की आँखे और भूख की लड़ाई ही उन दोनों की काया से नजर आ रही थी ।
खेर आज मेरा भी पूरा दिन छुप छुप कर इन दोनों मित्रो की समझने में जा रहा है । और लगभग इनकी जिंदगी को में करीब से समझ भी रहा था और सोच भी रहा था कैसे उन दोनों को इस वर्तमान से निकाल कर एक सम्मान जनक भविष्य की तरफ ले कर जाऊ ।
सोच - सोच में न जाने कब सुबह से शाम हो गई पता ही नही चला ,
शाम के 7 बज गए थे और इनदोनो के जाने का समय भी हो गया था । आखिर आज भी ओवरटाइम लगा कर ये मासूम चेहरे बेतहासा थक रहे थे ।
कंस्ट्रक्शन साइट से बाहर आते ही मेने इन बच्चो से बात करनी चाही । लेकिन इन दोनों ने मुझे नजरअंदाज करते हुए पास के ढाबे पर जाकर रोटी और आचार खरीदने लगे ।
और खाना खरीदकर शायद उशी फुटपाथ की और जा रहे थे जहाँ से ये सुबह आये थे ।

मैंने अब उनसे बात करने की कोशिश नही की और में भी अपने रास्ते चल दिया ।
आज में घर 1 घण्टा लेट पंहुचा था और घर पहुँचते ही अपने कमरे में जाकर रोने लगा । शायद मैंने आज असली जिंदगी को देखा था । बेबसी को पास से समझा था । भूख को तड़पते देखा था । बचपन को मिट ते देखा था । गरीबी को रोते देखा था । और ना जाने कितना दर्द देखा था ।
आज में जीवन को समझ गया था ।
लेकिन कहानी अभी ख़त्म नही हुई जुड़े रहना दोस्तों - जल्दी ही इस कहानी को एक खूबसूरत अंत दिया जायेगा !


Writer - Er. Aashish

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